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पवित्रा अथर्ववेद में सृष्टी रचना का प्रमाण

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”पवित्रा अथर्ववेद में सृष्टी रचना का प्रमाण“ काण्ड नं. 4 अनुवाक नं. 1 मंत्रा नं. 1 :- ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्त्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः।। 1।। ब्रह्मµजµज्ञानम्µप्रथमम्µपुरस्त्तात्µविसिमतःµसुरुचःµवेनःµआवःµसःµ बुध्न्याः µउपमाµअस्यµविष्ठाःµसतःµचµयोनिम्µअसतःµचµवि वः अनुवाद :- (प्रथमम्) प्राचीन अर्थात् सनातन (ब्रह्म) परमात्मा ने (ज) प्रकट होकर (ज्ञानम्) अपनी सूझ-बूझ से (पुरस्त्तात्) शिखर में अर्थात् सतलोक आदि को (सुरुचः) स्वइच्छा से बड़े चाव से स्वप्रकाशित (विसिमतः) सीमा रहित अर्थात् विशाल सीमा वाले भिन्न लोकों को उस (वेनः) जुलाहे ने ताने अर्थात् कपड़े की तरह बुनकर (आवः) सुरक्षित किया (च) तथा (सः) वह पूर्ण ब्रह्म ही सर्व रचना करता है (अस्य) इसलिए उसी (बुध्न्याः) मूल मालिक ने (योनिम्) मूलस्थान सत्यलोक की रचना की है (अस्य) इस के (उपमा) सदृश अर्थात् मिलते जुलते (सतः) अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म के लोक कुछ स्थाई (च) तथा (असतः) क्षर पुरुष के अस्थाई लोक आदि (वि वः) आवास स्थान भिन्न (विष्ठाः) स्थापित किए। भावार्थ :- पवित्रा वेदों को बोलन...

वर्तमान की खराब शिक्षा पद्धति

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वर्तमान मैं पढ़ने-लिखने का मतलब कुर्सी पर बैठ कर  आदेश देना  हो गया है पढ़े-लिखे लोगों को काम करने में लज्जा का अनुभव होता है इसलिए समाज की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है बुद्धि और हाथ का उपयोग सम्यक रूप से नहीं हो पा रहा है इसे भारत का ही नहीं पूरे विश्व का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आज ज्ञान और कर्म के बीच मेलजोल खतम हो गया है काम करने वाले के पास ज्ञान नही पहुँचता और ज्ञानी काम करना नहीं चाहता है जो लोग पढ़ार्इ करते हैं, वे ठंड, गर्मी, तथा बरसात की मार नहीं झेल सकते हैं जरा सा कुछ करना पड़ जाए तो बीमार हो जाते हैं या थक जाते हैं इसका परिणाम यह हुआ कि आज के शिक्षित लोग गूढ़ अनुभव को समझ नही पाते हैं ऊपरी तौर पर देखने पर लगता है कि आजकल चारो ओर शिक्षा का विस्फोट हो रहा है सभी पढ़-लिख कर नौकरी चाहते हैं, जिसके कारण सरकार के सामने भी विकट समस्या खड़ी हो गर्इ है आजकल विद्यार्थी, विद्यार्थी न रहे, परीक्षार्थी हो गये हैं वे साम-दाम-दंड-भेद अपना कर किसी तरह अधिक से अधिक अंक प्राप्त करना चाहते हैं जिसके कारण वे सच्चा ज्ञान प्राप्त करने से वंचित हो जाते हैं आजकल हम ज्ञान के बज...

दहेज प्रथा मौत की जड़ बन चुकी है

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प्राइम टाइम में दहेज प्रथा मौत की जड़ बन चुकी है वर्तमान में दहेज प्रथा कुरीति बन गई है और माताओं व बहनों का मृत्यु का कारण भी बन चुकी है आज का समाज बेटी अर्थात बहू की बजाय दहेज की भीख मांगता है दहेज प्रथा के कारण समाज में कई बेटियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा जैसा कि कई न्यूज़ चैनलों व अखबारों में देखने में आया है कि कई  माताएं व बहने अपने  ससुराल में दहेज के लिए परेशान करने के कारण आत्म हत्या कर लेती कई बहन और बेटियों कि अपने मायके से दहेज नहीं लाने के कारण या कम लाने के कारण उनकी भरपूर पिटाई भी होती है यही नहीं उनको जिंदा जला  दिया जाता है आज की युवा पीढ़ी और समाज को बहू नहीं बल्कि दहेज रूपी धन चाहिए और वह भी भीख में I  वर्तमान में भारत  को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को दहेज मुक्त बनाने के लिए  संत रामपाल जी महाराज  के अनुयाई  समाज में यह प्रस्तुत कर रहे हैं कि  बिना दहेज के भी विवाह हो सकता है जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ही यह काम कर सकते हैं आज संत रामपाल जी महाराज के लाखों अनुयायियों ...

पूर्ण संत की पहचान

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पूर्ण संत की पहचान (पवित्रा सद्ग्रन्थों से पूर्ण संत की पहचान) वेदों, गीता जी आदि पवित्रा सद्ग्रंथों में प्रमाण मिलता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है व अधर्म की वृद्धि होती है तथा वर्तमान के नकली संत, महंत व गुरुओं द्वारा भक्ति मार्ग के स्वरूप को बिगाड़ दिया गया होता है। फिर परमेश्वर स्वयं आकर या अपने परमज्ञानी संत को भेज कर सच्चे ज्ञान के द्वारा धर्म की पुनः स्थापना करता है। वह भक्ति मार्ग को शास्त्रों के अनुसार समझाता है। उसकी पहचान होती है कि वर्तमान के धर्म गुरु उसके विरोध में खड़े होकर राजा व प्रजा को गुमराह करके उसके ऊपर अत्याचार करवाते हैं। कबीर साहेब जी अपनी वाणी में कहते हैं कि- जो मम संत सत उपदेश दृढ़ावै (बतावै), वाके संग सभि राड़ बढ़ावै। या सब संत महंतन की करणी, धर्मदास मैं तो से वर्णी।। कबीर साहेब अपने प्रिय शिष्य धर्मदास को इस वाणी में ये समझा रहे हैं कि जो मेरा संत सत भक्ति मार्ग को बताएगा उसके साथ सभी संत व महंत झगड़ा करेंगे। ये उसकी पहचान होगी। दूसरी पहचान वह संत सभी धर्म ग्रंथों का पूर्ण जानकार होता है। प्रमाण सतगुरु गरीबदास जी की वाणी में -  ”सतगुरु क...

राम नाम शास्त्र प्रमाणित होना चाहिए

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राम का नाम भी शास्त्रा प्रमाणित होना चाहिए। प्रमाणित शास्त्रा कौन-कौन से हैं? 1ण् सुक्ष्म वेद 2ण् श्रीमद्भगवत गीता 3ण् चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद)। इन सद्ग्रन्थों में परमात्मा का दिया ज्ञान है। इसके अतिरिक्त 18 पुराण, उपनिषद् आदि-आदि ये ऋषियों का अपना अनुभव तथा श्री ब्रह्मा जी का दिया ज्ञान है। यदि इनका ज्ञान उपरोक्त सद्ग्रन्थों से नहीं मिला तो वह हमारे काम का नहीं है। ज्ञान को समझने के लिए पुराणों का सहयोग लिया जाता है क्योंकि अधिकतर हिन्दू पुराणों को सत्य मानते हैं। इसलिए पुराणों के प्रमाण देखकर सुक्ष्मवेद को आसानी से समझा जा सकता है। {भक्त समाज को ‘‘सुक्ष्म वेद’’ नया नाम होने से आश्चर्यजनक तो लगेगा क्योंकि यह वेद हमने सुना ही नहीं था। परन्तु यह प्रमाणित तथा सम्पूर्ण सद्ग्रन्थ है जो स्वयं परमात्मा ने पृथ्वी पर प्रकट होकर बताया तथा लिखवाया है। जिसका प्रमाण गीता तथा वेदों में है कि पूर्ण परमात्मा अपने निज स्थान जो आकाश में है, वहां से गति करके आता है। यहां अच्छी आत्माओं को मिलता है। उनको अपने मुख कमल से बाणी बोलकर वाणी द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान सुनाता है...

‘‘गज-ग्राह की कथा’’

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हाहा-हूहू नाम के दो तपस्वी थे। उनको अपनी भक्ति का गर्व था। एक-दूसरे से अधिक सिद्धि-शक्ति वाला कहते थे। अपनी-अपनी शक्ति के विषय में जानने के लिए ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी से पूछा कि हमारे में से अधिक सिद्धि-शक्ति वाला कौन है? ब्रह्मा जी ने कहा कि आप श्री विष्णु जी के पास जाओ, वे बता सकते हैं। ब्रह्मा जी को डर था कि एक को कम शक्ति वाला बताया तो दूसरा नाराज होकर श्राप न दे दे। हाहा-हूहू ने श्री विष्णु जी के पास जाकर यही जानना चाहा तो उत्तर मिला कि आप शिव जी के पास जाएँ। वे तपस्वी हैं, ठीक-ठीक बता सकते हैं। शिव जी ने उन दोनों को पृथ्वी पर मतंग ऋषि के पास जाकर अपना समाधान कराने की राय दी। मतंग ऋषि वर्षों से तपस्या कर रहे थे। अवधूत बनकर रहते थे। अवधूत उसे कहते हैं जिसने शरीर के ऊपर एक कटि वस्त्रा (लंगोट) के अतिरिक्त कुछ न पहन रखा हो। मतंग ऋषि शरीर से बहुत मोटे यानि डिल-डोल थे। जब हाहा-हूहू मतंग ऋषि के आश्रम के निकट गए तो उनके मोटे शरीर को देखकर हाहा ने विचार किया कि ऋषि तो हाथी जैसा है। हूहू ने विचार किया कि ऋषि तो मगरमच्छ जैसा है। मतंग ऋषि के निकट जाकर प्रणाम करके अपना उद्देश्य बताया...

‘भैंस का सींग भगवान बना’’

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एक पाली (भैंसों को खेतों में चराने वाला) अपनी भैंसों को घास चराता-चराता मंदिरके आसपास चला गया। मंदिर में पंडित कथा कर रहा था। भगवान के मिलने के पश्चात्होने वाले सुख बता रहा था कि जिसको भगवान मिल गया तो सब कार्य सुगम हो जाते हैं।परमात्मा भक्त के सब कार्य कर देता है। भगवान भक्त को दुःखी नहीं होने देता। इसलिएभगवान की खोज करनी चाहिए।पाली भैंसों ने तंग कर रखा था। एक किसी ओर जाकर दूसरे की फसल में घुसकरनुकसान कर देती, दूसरी भैंस किसी ओर। खेत के मालिक आकर पाली को पीटते थे।कहते थे कि हमारी फसल को हानि करा दी। अपनी भैंसों को संभाल कर रखा कर। पालीने जब पंडित से सुना कि भगवान मिलने के पश्चात् सब कार्य आप करता है, भक्त मौजकरता है तो पंडित जी के निकट जाकर चरण पकड़कर कहा कि मुझे भगवान दे दो। मैंभैंसों ने बहुत दुःखी कर रखा हूँ। पंडित जी ने पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा कि कलआना। पाली गया तो पंडित ने पहले ही भैंस का टूटा हुआ सींग जो कूड़े में पड़ा था, उठाकरउसके ऊपर लाल कपड़ा लपेटकर लाल धागे (नाले=मौली) से बाँधकर कहा कि ले, यहभगवान है। इसकी पूजा करना, इसको पहले भोजन खिलाकर बाद में स्वयं खा...