राम नाम शास्त्र प्रमाणित होना चाहिए

राम का नाम भी शास्त्रा प्रमाणित होना चाहिए। प्रमाणित शास्त्रा कौन-कौन
से हैं? 1ण् सुक्ष्म वेद 2ण् श्रीमद्भगवत गीता 3ण् चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद तथा अथर्ववेद)। इन सद्ग्रन्थों में परमात्मा का दिया ज्ञान है। इसके
अतिरिक्त 18 पुराण, उपनिषद् आदि-आदि ये ऋषियों का अपना अनुभव
तथा श्री ब्रह्मा जी का दिया ज्ञान है। यदि इनका ज्ञान उपरोक्त सद्ग्रन्थों से
नहीं मिला तो वह हमारे काम का नहीं है। ज्ञान को समझने के लिए पुराणों
का सहयोग लिया जाता है क्योंकि अधिकतर हिन्दू पुराणों को सत्य मानते हैं।
इसलिए पुराणों के प्रमाण देखकर सुक्ष्मवेद को आसानी से समझा जा सकता
है। {भक्त समाज को ‘‘सुक्ष्म वेद’’ नया नाम होने से आश्चर्यजनक तो लगेगा
क्योंकि यह वेद हमने सुना ही नहीं था। परन्तु यह प्रमाणित तथा सम्पूर्ण
सद्ग्रन्थ है जो स्वयं परमात्मा ने पृथ्वी पर प्रकट होकर बताया तथा
लिखवाया है। जिसका प्रमाण गीता तथा वेदों में है कि पूर्ण परमात्मा अपने
निज स्थान जो आकाश में है, वहां से गति करके आता है। यहां अच्छी
आत्माओं को मिलता है। उनको अपने मुख कमल से बाणी बोलकर वाणी
द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान सुनाता है। कवियों की तरह आचरण करता हुआ
पृथ्वी पर विचरण करता है। भक्ति के गुप्त मंत्रों का आविष्कार करके भक्तों
को बताता है। वह ‘‘सुक्ष्म वेद’’ है। उसे तत्वज्ञान भी कहते हैं। उस ज्ञान को
तत्वदर्शी सन्त ही जानता है, उससे जानों। प्रमाण के लिए ऋग्वेद मण्डल 9

सुक्त 86 मंत्रा 26.27ए ऋग्वेद मण्डल 9 सुक्त 82 मंत्रा 1.2ए ऋग्वेद मण्डल 9
सुक्त 94 मंत्रा 1ए ऋग्वेद मण्डल 9 सुक्त 95 मंत्रा 2ए ऋग्वेद मण्डल 9 सुक्त
96 मंत्रा 17 से 20ए ऋग्वेद मण्डल 9 सुक्त 20 मंत्रा 1ए ऋग्वेद मण्डल 9 सुक्त
54 मंत्रा 3ए यजुर्वेद अध्याय 29 मंत्रा 25ए अध्याय 5 मंत्रा 32ए गीता अध्याय 4
मंत्रा 32ए 34ए यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 तथा अन्य वेदों में अनेकों स्थानों पर
प्रमाण हैं कि पूर्ण परमात्मा स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर तत्वज्ञान (सुक्ष्म वेद)
अपने मुख से कविताओं, लोकोक्तियों, दोहों तथा चौपाईयों द्वारा बोलता है।
वास्तविक भक्ति के नाम (राम का नाम) बताता है। जिससे मोक्ष संभव है।
परंतु हम परमात्मा न पहचानकर सत्य ज्ञान व भक्ति से वंचित रह जाते हैं।}
जो राम का नाम अर्थात् भक्ति का मंत्रा वेदों (चारों वेदों) में, श्रीमद्भगवत्
गीता में लिखा है, वही राम का नाम जाप करने का है। इनसे आगे संपूर्ण
भक्ति विधि सुक्ष्म वेद में वर्णित है। वह भक्ति विधि चारों वेद तथा श्रीमद्भगवत्
गीता वाली तो है ही जो गीता और वेदों में नहीं है, उसके लिए तत्वदर्शी संतों
से जानने के लिए गीता अध्याय 4 श्लोक 32 तथा 34 में कहा है।
‘‘परमात्मा के कौन-से नाम से मोक्ष संभव है?‘‘
कुछ गुरूओं तथा ऋषियों का अपना मत है कि नाम के जाप से कोई लाभ
नहीं होता। केवल उस परमात्मा के गुणों का चिंतन अपने मन-मन में करें।
उदाहरण देते हैं कि जैसे ‘‘मिश्री‘‘ कहने से मुख मीठा नहीं होता।
यह तर्क वेद विरूद्ध है। यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 15 में स्पष्ट किया है कि
¬ (ओम्) नाम का जाप करना चाहिए। श्रीमदभगवत् गीता के भी विरूद्ध है
क्योंकि गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में स्पष्ट है कि ¬ (ओम्) नाम का स्मरण
(जाप) अंतिम श्वांस तक करना चाहिए।

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